गाँव के कोने में एक टूटी-फूटी झोपड़ी में रहने वाला हरिया दिन भर मजदूरी करता और शाम को शिव मंदिर के बाहर बैठकर घंटों ‘बोल बम’ का जाप करता था। उसके पास पहनने को ढंग के कपड़े नहीं थे, खाने को दो वक्त की रोटी भी कभी मिलती, कभी नहीं। लेकिन उसके चेहरे पर हमेशा एक अजीब सी शांति और भोलेनाथ के लिए एक नटखट मुस्कान होती। लोग मज़ाक उड़ाते थे, कहते, “हरिया, ये भोले बाबा तुझे क्या दे रहे हैं? तू मंदिर के बाहर बैठता है, भूखा सोता है, और ऊपर से मुस्कराता भी है!” हरिया बस इतना कहता—“मैं मांगने नहीं आता, मैं बाबा को सुनाने आता हूँ… और जो सुन लेता है, वो देर-सवेर देता भी है।” समय बीतता गया। एक दिन गाँव में भारी बारिश आई, बाढ़ जैसा हाल हो गया। खेत बह गए, कई घर गिर गए। हर कोई परेशान, डर में था। लेकिन मंदिर का वो पुराना चबूतरा और शिवलिंग जैसें का तैसा खड़ा रहा। हरिया वहीं बैठा भीगता रहा, पर शिव का नाम नहीं छोड़ा। अगले दिन जब प्रशासन और गाँव के लोग राहत लेकर पहुंचे, तो उन्होंने देखा कि हरिया ने मंदिर में कई बच्चों और बूढ़ों को अपने चद्दर से ढककर पूरी रात संभालकर रखा था। किसी को बुखार नहीं, किसी को चोट नहीं। ...